Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 30,31
संस्कृत श्लोक
दशरथ उवाच ।
स्वागतं तेऽस्तु भो राजन्निदमासनमास्यताम् ।
अनेकभवसंभारभ्रान्त विश्रम्यतामिह ॥ ३० ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
वदत्येवं दशरथे विपश्चिद्भासनामभृत् ।
विवेश विष्टरे विश्वामित्रादीन्प्रणमन्मुनीन् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्वर, यदि आपकी
मेरे ऊपर कृपा है तो वे विपश्चित् किस प्रकार के कितने दूरवर्ती जगतों में भ्रमण करते हैं, यह मुझे
बतलाने का अनुग्रह कीजिये । हे मुनिश्वर, कितने मार्ग में वे संसार हैं, जिनमें वे उत्पन्न हुए, यह महान्
आश्चर्यमय वृत्तान्त हे, जो कि आपने हमसे कहा