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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 38

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : जैसे अवयवी सदा सकल अवयवो को जानता हे वैसे ही ब्रह्मात्मा में स्थित सकल ब्रह्माण्डं को मैं जानता हूँ भाव यह कि यह दूर हे, यह अत्यन्त दूर हे, यह सब विचार आत्मा को परिच्छिन्न माननेवालों में ही सम्भव हे । आत्मा को अपरिच्छिन्न जाननेवालों की दृष्टि में अवयवी की दृष्टि मेँ अवयवो की भाँति सब कुछ अति समीप में ही है, यह मैं अपने अनुभव से कहता हूँ, यह सारांश है