Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 37
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, वह विपश्चित् इसी जगत् से उस दिगन्तदर्शनरूप
गति को गया। यहीं पर आज वह मृग बना हे, यह कैसे युक्तियुक्त है ? ? जब तक वह लौटकर आये नहीं,
तब तक उसका यहाँ मृगजन्म संभव नहीं है, यह भाव है