Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 107
एक सौ पाँचवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छठवां सर्ग विविध लक्षणों से पुनः चिदाकाश का प्रदर्शन-सा किया जाता है ओर चिदाकाश ही जगत् है इसका विस्तार से वर्णन।
63 verse-groups
- Verse 1विस्तार से वर्णित जयत् की स्वप्न-दुल्यता से जिस प्रकार का विदाकाशमात्र तत्व ज्ञातव्य हैं…
- Verse 2पूर्व प्रस्तुत श्रीरामवन््रजी के प्रश्न का उत्तर देने के लिए श्रीवभिष्ठजी जाग्रत स्वप्न क…
- Verse 3दो जलो की तरह वस्तुतः इन दोनों में (जाग्रत् और स्वप्न में) भेद नहीं है, ये दोनों निर्मल…
- Verse 4उक्त चिदाकाश के परूवोक्त लक्षण का स्मरण कराते हुए प्रथम कहते हैं / एक देश से दूसरे देश मे…
- Verse 5जड़ों से पृथिवी का रस खींचते हुए वृक्ष का जैसा हासवृद्धिशून्य आह्लादभाव प्रसिद्ध है वैसा…
- Verse 6जिसकी सकल कामनाएँ निवृत्त हो चुकी हों, चित्त शान्त हो चुका हो, उस पुरष का जैसे सकलविषमताश…
- Verse 7निद्रा आने के पूर्व ओर जागरण के अन्त में (नींद न आई हो तुरन्त आने ही वाली हो, जाग्रत में…
- Verse 8वर्षाऋतु या शरव्त्ऋतु में वृद्धि को प्राप्त हो रहे पेड, पौधे ओर झाड़ियों का जो ममताहीन आन…
- Verse 9बाह्य विषय ओर आभ्यन्तर विषयों के भोग से रहित जीवित पुरुष का शरद ऋतु के आकाश के समान स्वच्…
- Verse 10ब्रह्मा ने काठ, पत्थर और पर्वतो की जो निश्चेष्ट स्थिति का निर्माण किया हे वही यदि चेतन जी…
- Verse 11जिससे सुषुप्ति के साक्षी, स्वप्न ओर जाग्रत के द्रष्टा, दर्शन ओर दृश्यरूप त्रिपुटी का उदय…
- Verse 12विविध प्रकार के सभी पदार्थज्ञान जिससे ही उदित होते हैं और जिसमें ही आलोचन, विमर्श, अध्यवस…
- Verse 13जिसमें सब कुछ लीन होता है, जिससे सब उदित होता है, जो सर्वस्वरूप है, जिसने सबको सर्वतः व्य…
- Verse 14स्वर्ग में, भूमि में, बाहर तथा अपने अन्दर ओर दूसरे के अन्दर जो समनाम का ज्योतिस्वरूप परमत…
- Verse 15जिस नित्य असीम विराट् मेँ मजबूत तारों मे माला की तरह मूर्तं ओर अमूर्त यह सारा जगत् स्थि…
- Verse 16जिससे सृष्टि ओर प्रलयरूप सब विकार उत्पन्न होते हैं, जिसमें लीन हो जाते हैं और जो सबका उपा…
- Verse 17सुषुप्ति ओर प्रलयरूप निद्रा के निवृत्त होने पर जिस प्रत्यगात्मा से विक्षेपशक्तिवश जाग्रत…
- Verse 18जिसके उन्मेष ओर निमेष से (पलक उठाने ओर गिराने से) जगत् सत्ता के प्रलय और उदय ({)) होते ह…
- Verse 19यह नहीं हे, यह नहीं है इस प्रकार सब तरह से भलीभाँति निर्णय कर जो कुछ नहीं है, सदा सर्वरूप…
- Verse 20आधे पलक में (झटपट) दूर से एक देश से दूसरे देश की प्राप्ति में मध्य में जो संवित् का रूप…
- Verse 21चिदाकाश के लक्षणों के निरृपएणकर उसकी अद्वितीयता की सिद्धि के लिए।विश्व की तन्मयता दशती है…
- Verse 22ऐसी परिस्थिति में प्रलयअवस्था से सृष्टि अवस्था की भेदप्रतीति कैसे हो गयी इस आशंका पर कहते…
- Verse 23उक्त अन्यताभ्रान्ति वास्नावश होती हैं, जिसे वासना नहीं है. उसे उक्त श्रम नहीं होता, ऐसा क…
- Verse 24वासनाविहीन शान्तचित्त आप चैतन्य रहते पाषाणवत् मौन धारणकर आत्मानन्द में निमग्न होकर बोलिय…
- Verse 25यह जो दृश्य आपके आगे दिखते हैं, इसका मृगतृष्णा-जल के समान तथा चन्द्रमा में प्रतीत हो रहे…
- Verse 26कारण के अभाववश यह सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न ही नहीं हुआ । क्योंकि कारण के अभाव में क…
- Verse 27यदि किये कि जो कोई बीज से अंकुर आदि कार्य, अन्वय-व्यतिरेक के दिखाई देने से बिना कारण के उ…
- Verse 28हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्यों-का-त्योंही वह पूर्वरूप स्थित रहता है फिर भी जैसे अद्वितीय भी चन…
- Verse 29अद्वितीय श्रह्म ही वह हे तो उसमें अन्यथा ज्ञान केसे होता है ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं।…
- Verse 30इसलिए न तो दृश्य उत्पन्न हुआ है, न इस समय है और न आगे होगा तथा न नष्ट होता है, जो है ही न…
- Verse 31विश्व (जगत्) परम शान्त चिदाकाश ही है, चिदाकाश ही विश्व के आकार से स्थित है । वह परिणामवश…
- Verse 32यदि कड प्रश्न करें कि परिणाम से वह जगद्रूप क्यों नहीं होता 2 तो इस्रपर उसकी (दृश्य की) ब…
- Verse 33यदि द्रष्टा और द्र्य अत्यन्त असत् हैं; तो उनकी प्रतीति कैसे होती हे 2 अत्यन्त असत्का तो…
- Verse 34श्रीरामचन््रजी की शंका में प्रथम श्लोक द्वारा अस् के भान का सभव स्वीकार कर द्वितीय श्लोक…
- Verse 35अतएव यह द्रष्टा दृश्य असत् का रुप नहीं हैं, किन्तु परमार्थ ब्रह्म का रुप हैं, ऐसा कहते ह…
- Verse 36यह परमात्मा का ही रुप है, यह केसे जाना 2 इस आशंकापर स्वप्नद्ृष्टान्त से जाना, यह कहते हैं…
- Verse 37यदि कोई कले कि तब इसकी स्वप्नसमानता कैसे है, तो सकल कारणकलापशून्य छुष्गप्तिवुल्य प्रलय से…
- Verse 38अपने आप आत्मा में चिदाकाश का जो विशेष स्फुरण होता है, वह उसीका जगत् नाम से आविर्भूत शरीर…
- Verse 39निर्धषक चिदाकाश की जयद्धर्मकता कैसे 2 ऐसी आशंका होने पर मायिक विकल्प से ही उसकी जयद्वर्मक…
- Verse 40सैन्धवघन के समान एकरस परमार्थवस्तु ही माया में चिदाभास इस प्रकार त्रिपुटीरूप होकर स्थित ह…
- Verse 41माया का त्याग होने पर तो द्वैत का अभाव होने से न भासक है और न भासन है, अनिवर्चनीयरूप यह स…
- Verse 42श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, “न भास्य है और न भासन है आपके इस कथन के अनुसार यदि…
- Verse 43पहले प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, अपना आत्मा भी चित…
- Verse 44वह कार्यकारण भावादि आकार चिदाकाश ही है जैसे कि मिट्टी ही घड़ा है, इसलिए चिदाकाश ही इसका उ…
- Verse 45दुग्धभाव से दधिभाव की प्राप्ति में और पिण्डभाव से घटभाव की प्राप्ति में पूर्वभाव की निवृत…
- Verse 46जेते इश्वर की जीवभाव कल्पना पर कड आक्षेप करनेवाला नहीं हैं वैसे ही जीव की भरी अपनी अविद्य…
- Verse 47आत्मा से अन्य के कर्ता और भोक्ता होने पर तो प्रश्न या आक्षेप हो ही सकता है, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 48जिस स्वप्न में निराभास शुद्ध एक चिदाभास ही अनेक रूपों से विराजमान होता है, वहाँ पर कौन कि…
- Verse 49स्वयम्भू से लेकर ही यह सृष्टिभ्रान्ति तत्त्व के परिज्ञान के अभाव से चिन्मात्र में प्रतीत…
- Verse 50यह सृष्टिभ्रान्ति ही तत्त्वतः परिज्ञात न होकर शास्त्रों में माया के नाम से पुकारी जाती है…
- Verse 51जैसे अविद्यमान पिशाच भी बालक को अपनी कल्पनावश विद्यमान-सा प्रतीत होता है वैसे ही चिदाकाश…
- Verse 52जैसे स्वप्न में अद्यत् में सत् प्रतीति और निरवयव में सावयव प्रतीति होती हैं वैसे ही यहा…
- Verse 53मैं मेरु, हिमालय आदि पर्वत हूँ, मैं रुद्र हूँ, में समुद्र हूँ, मे विराट् हूँ, यों स्वप्न…
- Verse 54चित्-अनुभव ही सर्य हैं, यह क्यों कहते हैं ? प्रधान, परमाणु आदि अन्यान्य कारणों से ही यह…
- Verse 55अवयवशून्य चिन्मात्ररूप यह आकाश बिना किसी कारण के ही चिदाकाश द्वारा चिदाकाश में जगद्रूप से…
- Verse 56सभी जीव- जन्तुओं ने दर्पण के सदृश अपने अन्दर जगद्भेद की कल्पना कर रक्खी है । विचार न करने…
- Verse 57तत्-तत् नामरूपस्वरूप का त्यागकर परिशिष्ट चिन्मात्र आकाश ही है, यों जगत् को चिन्मात्र ज…
- Verse 58चित् कैसे जयत् के रुप से स्थित है 2 इस प्रश्न पर कहते हैं / जैसे जल अपने शरीर को परिचाल…
- Verse 59जब अल्पशक्तिवाले कल्पदुम आदि भी सकल्पित वस्तुओं की कल्पना करने की शक्ति रखते हैं तब सर्वश…
- Verse 60आकाशात्मक चिति चिन्तामणि ओर कल्पवृक्ष के समान शीघ्र ही अपने से अपने अभीष्ट (वांछित) का सम…
- Verse 61पलक भर में एक स्थान से दूसरे स्थान में प्राप्ति होने पर मध्यमे जो चिति का अशेषविशेषशून्य…
- Verse 62इस तरह अनन्त भास्वर चित्प्रभा ही जगत् के वेष से स्पष्टतया स्फुरित होती है । जैसे आकाश मे…
- Verse 63सृष्टि के प्रारम्भ में चित् से विसदृश (विलक्षण यानी जड) कार्य का उद्भव नहीं हो सकता है,…