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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

अतो जीवन्नपि मृत इव सर्वोऽवतिष्ठते । असावहं च त्वं चेति जीवन्तोऽपि मृता इव ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व प्रस्तुत श्रीरामवन््रजी के प्रश्न का उत्तर देने के लिए श्रीवभिष्ठजी जाग्रत स्वप्न की कल्यता का ऱमचन्द्रजी के प्रश्नोत्तर की पूर्वपीठिका के रूप से अनुवाद करते है / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : जैसे समान रूपरेखावाले दो यमज (जुडवे) भाइयों के, व्यवहार के लिए, दो पृथक्‌ नाम रक्खे जाते हैं वैसे ही अखण्ड चिद्रूपी शिलामय (अखण्ड-चिद्रूपी शिला में प्रतिबिम्बितप्राय) समान रूपरेखावाले जाग्रत-स्वप्नरूप दोनों प्रपंचो के दो नाम रक्खे जाते हैं