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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 56

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सभी जीव- जन्तुओं ने दर्पण के सदृश अपने अन्दर जगद्भेद की कल्पना कर रक्खी है । विचार न करने से (स्वरूपज्ञान सामर्थ्य से शून्य होने के कारण) जड़ होकर वे जीर्णं हो गये हैं | किन्तु विचार कर रहे पुरुषश्रेष्ठ का तो परम पुरुषार्थ, प्रत्यगात्मरूप से अपने अन्दर होने के कारण, समीपगत ही है