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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 42

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, “न भास्य है और न भासन है आपके इस कथन के अनुसार यदि परमार्थ तत्त्व द्रष्टा और दृश्य दोनों से शून्य है, तो कार्य कारणतादिरूप भेद कैसे है ? द्रष्टा के बिना किसीकी सिद्धि नहीं हो सकती है । और दूसरी बात यह कि वह किस उपदान कारण या निमित्त कारण से आया । यदि असत्य ही हे, कहें तो कैसे सत्यता को प्राप्त हुआ अर्थात्‌ कैसे सब लोगों को सत्यरूप से भासित होता है ? यह मुझे बतलाने की कृपा करें