Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
आकाशकाचकच्यात्म यदिदं किंचिदाततम् ।
न किंचिदेव तद्विद्धि किंचिद्व्योम्नि कुतो भवेत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त चिदाकाश के परूवोक्त लक्षण का स्मरण कराते हुए प्रथम कहते हैं /
एक देश से दूसरे देश में पलक भर में गई हुई संवित् का मध्य में जो निर्विषय रूप है, वही
चिदाकाश कहा जाता है