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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 46

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जेते इश्वर की जीवभाव कल्पना पर कड आक्षेप करनेवाला नहीं हैं वैसे ही जीव की भरी अपनी अविद्या से कार्यकारणरूप अवस्थाओं की (द्रष्टा, दृश्य और द्शनरूप अवस्थाओं की) कल्पना में भी आक्षेप करना युक्त नहीं है, यह कहते हैं । यह अविद्या से उत्पन्न हुई कार्यकारणभाव आदि दृष्टियों की जगत्‌ की नाई कल्पना करता है। इसके प्रति आक्षेपकर्ता कौन हो सकता है ? कोई भी अपने प्रति 'मैं किसलिए ऐसा करता हूँ, - यों प्रश्न या आक्षेप नहीं कर सकता है, यह भाव है