Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 33
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि द्रष्टा और द्र्य अत्यन्त असत् हैं; तो उनकी प्रतीति कैसे होती हे 2 अत्यन्त असत्का
तो कहीं भान नहीं दिखाई देता, यों श्रीरमचन्द्रजी शंका करते हैं /
हे ब्रह्मन्, यदि द्रष्टा ओर दृश्य असत् हैं, तो कृपया कहिये कि यह द्रष्टा और दृश्य का
अवभास क्यों ओर कैसे होता है ? यद्यपि हे वक्ताओं में सर्वश्रेष्ठ, भगवन्, आप इस विषय का
प्रतिपादन पहले कर चुके हँ तथापि पुनः कहने की कृपा कीजिये