Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 20
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
आधे पलक में (झटपट)
दूर से एक देश से दूसरे देश की प्राप्ति में मध्य में जो संवित् का रूप है वह चिन्मात्ररूप कहा गया
है । (अधोन्मिष इसलिए कहा कि विलम्ब होने पर वृत्ति का विच्छेद होने या अन्य विषय का सम्पर्क
होने से शुद्ध विदाकाश नहीं पहिचाना जा सकता / उपक्रम में उक्त का पुनः कथन उपसंहार
जतलाने के लिए है /