Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 62
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इस तरह अनन्त भास्वर चित्प्रभा ही जगत् के वेष से स्पष्टतया स्फुरित होती है । जैसे
आकाश में शून्यता नीलता के सदृश स्फुरित होती है वैसे ही अवयवरहित भी वह दृश्यता है