Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 107, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 54
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
चित्-अनुभव ही सर्य हैं, यह क्यों कहते हैं ? प्रधान, परमाणु आदि अन्यान्य कारणों से ही यह
उत्पन्न हुआ है, यह क्यों नहीं कहते, इस आशंका पर कहते हैं /
साकार कारण के अभाव से कुछ भी कार्य उत्पन्न नहीं हुआ, महाप्रलयरूपी चिदाकाश में
चित् इस तरह जगद्रूप से स्थित है