Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 47
छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग मोर के अण्ड के रस में उसके पंख, वर्ण तथा अन्य अवयवो की रचना के भेद की नाई बविल्वशिलाख्यान के तात्पर्य का वर्णन ।
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- Verse 1बिल्वफल का दृष्टान्त देने के कारण वह अचिद्रूप ही है, ओर उस बिल्वफल के भीतर के बीज, मज्जा…
- Verse 2तब क्या चिति-तत्त्व से अन्य ही सर्ग है ? इस पर यह भी नहीं कहा जा सकता, यह कहते है। चूँकि…
- Verse 3तब क्या ये सर्ग आदि असत् ही है ? इस पर यह भी नहीं कहा जा सकता“ यह कहते है । निखिल शब्दों…
- Verse 4इससे प्रातिभासिक अनुक्रमो के वैचित्र्य चिति के अधीन हैं, इस आशय से ही उसकी फलरूप से उत्प्…
- Verse 5उनमें अनानात्व आदि अंश ही प्रथम होने से सत्य हैं, यह कहते हैं। वह चिति अद्वितीय होने पर भ…
- Verse 6शिलाख्यान का तात्पर्य दिखलाते हैं। “शिलान्तःसन्निवेशवत् जगत् (शिला के भीतर चित्रित कमल…
- Verse 7अथवा जैसे चिन्तामणि में चिन्तको के सभी मनोरथरूप फल विद्यमान रहते हैं, वैसे ही चिति में मा…
- Verse 8किंवा, मोती के सीप के संपुट में कल्पित विकाररूप अंशांशिभाव से जैसे मोती रहते हैं, वैसे ही…
- Verse 9जैसे सूर्य अपने में ही स्व-स्वरूपाविर्भावरूप दिन एवं स्व-स्वरूपतिरोभावरूप रात्रि का विभाग…
- Verse 10अथवा, समुद्र के भीतर स्थित आवर्त (मँवर), तरंग आदि स्पन्द-भेद जैसे समुद्ररूप ही हैं, वैसे…
- Verse 11अथवा, वर्तमानकालीन सृष्टि और अतीत एवं अनागतकालीन (भूत एवं भविष्यत्कालीन) सृष्टि की परस्प…
- Verse 12इसी प्रकार बिल्वाख्यान का भी जगत् की चिन्मात्रसारता में ही तात्पर्य है, इस आशय से कहते ह…
- Verse 13अथवा पद्म आदि शब्दों और उनके नाना अर्थो को शिलोदर से पृथक् करने पर जैसे उनकी कुछ भी सत्त…
- Verse 14यदि चिति से अविभक्तस्वरूप ही यह जगत् आदि है यानी इसे चिति से पृथक् नहीं करते तो नाना हो…
- Verse 15श्रीरामजी, मरु-मरीचिका मृग की दृष्टि में निर्मल जल-राशि ही है और "यह स्थल ही हे" यों विवे…
- Verse 16जिस प्रकार समुद्र मध्यमे द्रवत्व होने से भलीभाँति प्रस्पन्दित (संचलित) होता है, उसी प्रका…
- Verse 17तब जैसे वहाँ पद्म आदि शिलामय प्रतीत होते है, वैसे ही जगत् के शंख, पद्म आदि भी चिन्मय प्र…
- Verse 18दृष्टान्तरूप से कही गयी प्राकृत शिला भी परमार्थ-दुष्टि से विति-शिला का उदर ही है यानी चित…
- Verse 19जिस प्रकार 'शरत्-काल तपता है (अमृत टपकानेवाला सोम स्फुरित हो रहा है” यों एकमात्र कालस्वर…
- Verse 20ऐसी स्थिति में (जगद्रूप से यह जगत् मानों सदा नष्ट है” अथवा ब्रह्मरूप से मानों सदा स्थित…
- Verse 21चिदात्मरूप से जगत् का अस्तित्व मानने पर "जगत्" और ब्रह्म शब्द के अर्थ में भेद नहीं है,…
- Verse 22चिति के स्वरूप की नाई जगत् के भी भाव, अभाव आदि विकार कभी नहीं होते, क्योंकि जिस प्रकार म…
- Verse 23श्रीरामभद्र, चूँकि-जैसे धूप से बर्फ आदि केवल जलरूप ही हो जाते हैं, वैसे ही मेरु आदि अत्यं…
- Verse 24विचार करने पर स्थूल पदार्थ भी एकमात्र यूक्ष्मरूप ही हो जाते हैं, इसमें युक्ति बतलाते हैं।…
- Verse 25इसीलिए जल-परमाणुगत रसशक्ति जिस प्रकार स्थूल- जल में परत्यक्षगोचर होती है, उसी प्रकार घट आ…
- Verse 26स्थूल पदार्थ के वैचित्र्य से सत्ता के अवान्तर धर्मरूपो से ही सत्ता का जो वैचित्र्य होता ह…
- Verse 27नील, पीत आदि चित्र- विचित्र रूपों में जो यह आलोक परमाणुता यानी सूक्ष्मभूत सत्ता है, वह ब्…
- Verse 28जैसे आविभाव-दशा में कार्यरूप से कारण ही स्थित रहता है, वैसे ही तिरोभावदशा में कारणस्वरूप…
- Verse 29जिस प्रकार मोर के अण्डे के रस में चित्र-विचित्र पंखों का समूह भासता है, उसी प्रकार जगत्…
- Verses 30–31जैसे मोर के अण्डे का रस और मोर-पंख काल्पनिक भेद-दृष्टि से भिन्नरूप भासते हैं, वैसे ही जगत…
- Verse 32ऐसी स्थिति में जैसे वहाँ (मयूराण्डरसरूप दष्टान्त-स्थल मे) कल्पित भेद वास्तव में अभेदका वि…
- Verse 33ओर उस तत्त्व का स्वरूप, अद्वितीय होने के कारण, भिन्न एवं अभिन्न स्वभाव से अनुभूत जगत् हो…
- Verse 34श्रीरामजी, जैसे जगत् में चैतन्यात्मक तत्त्व अनुस्यूत है, वैसे ही मयूर में मयूराण्डरस भी…
- Verse 35उपमा द्वारा कहे गये अर्थ को रूपक से एकीकरण कर दिखलाते हुए भेद का निरास करते हैं। अनेकविध…