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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

अहोरात्रं विकरयन्वेदनावेदनान्यलम् । चिदादित्यः स्थितो भास्वाञ्जगद्द्रव्याणि दर्शयन् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे सूर्य अपने में ही स्व-स्वरूपाविर्भावरूप दिन एवं स्व-स्वरूपतिरोभावरूप रात्रि का विभाग करता है, वैसे ही चितिरूप मणि-शिला भी जगदात्मक द्रव्यों का स्वसंवेदनरूप (स्वानुभवरूप) प्रकाश एवं स्व-असवेदनरूप अप्रकाशन अपनी आत्मा में ही करती है, इस अर्थ में उसका तात्पर्य है, यह कहते हैं । देदीप्यमान यह चितिरूप सूर्य अनुभव और अननुभव रूप दिन-रात का विभागकर जगद्रूप द्रव्यों को भलीभाँति प्रकाशित कर रहा अपनी आत्मा में ही स्थित है