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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

परमाम्बुविभागेन यद्रूपं तत्परं विदुः । तत्समूहस्तदेवोच्चैश्चित्तं मेरुतृणादिकम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

विचार करने पर स्थूल पदार्थ भी एकमात्र यूक्ष्मरूप ही हो जाते हैं, इसमें युक्ति बतलाते हैं। पंचीकृत मेरु, तृण आदि स्थूल-भूत अपंचीकृत सूक्ष्म-भूतों का समूह ही है ओर अपंचीकृत भूत तो चित्त ही है, यों जोरों से यानी दृढता से क्रमशः विचार करने पर ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है । जो सूक्ष्म वस्तु मेँ साररूप से अनुभूत होता है, वह निश्चय स्थूल वस्तु में सारतररूप से अनुभूत होता हे