Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैवालोकनाच्छुद्धं भवत्यम्बु यथातपः ।
मेर्वादेस्तृणगुल्मादेश्चित्तादेर्जगतोऽपि च ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामभद्र, चूँकि-जैसे धूप से बर्फ आदि केवल जलरूप ही हो जाते
हैं, वैसे ही मेरु आदि अत्यंत स्थूल-पदार्थ भी तत्त्व-दृष्टि से देखने से शुद्धत्व एवं अस्थूलत्व आदि
धर्मयुक्त ब्रह्मरूप ही हो जाते हैं-इसलिए तृण, गुल्म आदि से लेकर ब्रह्माण्डान्त बाह्य-जगत् का
ओर चित्त से लेकर हिरण्यगर्भान्त आन्तर जगत् का जो, जल के सदृश उत्तरोत्तर परमसूक्ष्मतम
भूतसूक्ष्म से अव्याकृत अक्षर तक के विभाग द्वारा, अंत में रूप अवशिष्ट रहता है; वही परब्रह्म है,
यों ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं