Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यदस्ति तच्चिति शिलाशरीरे शालभञ्जिका ।
यन्नास्ति तच्चिति शिलाशरीरे शालभञ्जिका ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा, वर्तमानकालीन सृष्टि और अतीत एवं अनागतकालीन (भूत एवं भविष्यत्कालीन)
सृष्टि की परस्पर समानता होने से उनकी एकमात्र वैतन्यरूपता के प्रदर्शन में ही उसका तात्पर्य है,
यह कहते हैं ।
जो वर्तमानकालिक जगत् है, वह चिति में एक तरह से मानों पाषाण-शिला में खुदी गई प्रतिमा के
सदृश हे । ओर जो जगत् वर्तमानकाल में नहीं है यानी भूत एवं भविष्यत्कालिक जो जगत् है, वह एक
तरह से मानों चिति में पाषाणशिला में न खुदी गयी प्रतिमा के सदृश है