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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

गुणगुण्यर्थसत्तात्मरूपिण्यासां परात्मता । चिति चित्तेऽस्ति मेर्वादि तदभिव्यञ्जनात्मनि ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे आविभाव-दशा में कार्यरूप से कारण ही स्थित रहता है, वैसे ही तिरोभावदशा में कारणस्वरूप से कार्य भी स्थित ही रहता है, यह भी दृष्टान्त द्वारा बतलाते हैं। सर्वथा तिरोभाव-दशा में मायाशबलित चिति में और अर्ध-तिरोभाव-दशा में चित्त में, जो कि स्थूल-कार्यो के अभिव्यंजकस्वरूप है, मेरु आदि स्थूल-कार्यो का समूह उस प्रकार स्थित है, जिस प्रकार मोर के उपादान-कारणरूप अण्डे के रस में चित्र-विचित्र मोरपंखों का समूह एवं कठिनता स्थित रहती है