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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

विचित्रपिच्छिकापुञ्जो मयूराण्डरसे यथा । यथा नानात्मिके ह्येव बर्ह्यण्डरसबर्हिते ॥ ३० ॥ विवेकदृष्ट्या दृष्टे ते तथा ब्रह्म जगत्स्थितम् । सनानातोऽप्यनानातो यथाऽण्डरसबर्हिणः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मोर के अण्डे का रस और मोर-पंख काल्पनिक भेद-दृष्टि से भिन्नरूप भासते हैं, वैसे ही जगत्‌ और ब्रह्म भी काल्पनिक भेद-दृष्टि से भिन्नरूप भासते हैं, वास्तव में जगत्‌ ब्रह्मरूप ही स्थित है