Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अद्वैतद्वैतसत्तात्मा तथा ब्रह्मजगद्भ्रमः ।
यथा सदसतोः सत्ता समतायामवस्थितिः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में जैसे वहाँ (मयूराण्डरसरूप दष्टान्त-स्थल मे) कल्पित भेद वास्तव में अभेदका
विरोधी नहीं है, वैसे ही यहाँ (वाष्टन्ति-स्थल में ) भी समझना चाहिए, यह कहते है ।
जिस तरह वह मोर के अंडे में रसात्मक मयूर कल्पित नानारूप होने पर भी परमार्थतः एकरूप होने
से द्रैताद्रैतात्मक होता है, उसी तरह ब्रह्यात्मक जगद्भम भी कल्पित नाना रूप होने पर भी परमार्थतः
एकरूप होने से द्वैताद्वैतात्मक है ॥ ३ १॥ तब क्या ब्रह्म द्वैत एवं अद्वित दोनों रूप है ? ऐसी शंका पर कहेंगे
कि उसके दोनों रूप मानने में कोई आपत्ति नहीं दी जा सकती; क्योकि जैसे ब्रह्म सत्यरूप है और
जगत् भ्रमरूप है, वैसे ही उसका द्वैत एवं अद्वैत रूप भी हो सकता हे । ऐसा मानने से कोई विषमता भी
नहीं आ सकती, क्योकि जैसे सत्ता की समता में (सत्तासामान्यरूप में) सत् एवं असत् की अवस्थिति
होती है, वह कहा ही जा चुका हे । (इस पर कोई शंका करें कि विषमता का परिहार करने के लिए आप
सत्ता की समता में ही अवस्थान क्यों मानते हैँ, क्योकि अभावमात्रता आपत्तिरूप शून्यता मानने पर भी
विरोध का परिहार हो सकता है ? तो इस पर कहते हैं ।) चूंकि अभाव का (असत् का) निरूपण भी
सतपदार्थ के बिना नहीं हो सकता, इसलिए सत्-असत् दोनों का तत्त्व सद्रस्तुरूप भाव में ही पर्यवसित
है, न कि शून्यरूप में ओर उस भाव को यानी सद्रूप में पर्यवसित को आप परब्रह्म ही जानिए