Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चित्तत्त्वस्य फलस्येव चितः स्वापापरक्रमात् ।
स्वसत्तासंनिवेशेन यः स सर्ग इति स्थितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
बिल्वफल का दृष्टान्त देने के कारण वह अचिद्रूप ही है, ओर उस बिल्वफल के भीतर के बीज,
मज्जा आदि की तरह स्वगत-भेद से वहाँ चित्-समसत्ता ही सर्गोत्पत्ति है यानी जब तक चिति रहेगी
तब तक सृष्टि की उत्पत्ति होती रहेगी, यह वर्णित है, यों तात्पर्य का भ्रम न हो, इसलिए उसका
तात्पर्य बतलाते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, फलसदृश चितितत्त्व के गर्भ में स्थित यह जगत् प्रसिद्ध
स्वाप (अज्ञान निद्रा) से अन्य एक तरह से चिति का स्वाप ही है, वह क्रम से यानी युग, वर्ष आदि क्रम
से चितिसत्ताद्वारा कल्पित सन्निवेश से (अवयव-विन्यास से) प्रवृत्त हे ओर वह चिति की समसत्तावाला
चिद्गत भेद स्वरूप नहीं है। तात्पर्य यह है कि जब तक चि6द्रूपतत्त्व स्व-स्वरूप के ज्ञान से रहित है तब
तक ही उसके गर्भ में सर्ग है, यह बतलाने के लिए अचेतन फल का दृष्टान्त दिया गया है
सर्ग सन्दर्भ
छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग मोर के अण्ड के रस में उसके पंख, वर्ण तथा अन्य अवयवो की रचना के भेद की नाई बविल्वशिलाख्यान के तात्पर्य का वर्णन ।