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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

समस्तशब्दशब्दार्थवासनाकलनाविदः । एकात्मत्वादसच्चेदमिति संकथ्यते कथम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्या ये सर्ग आदि असत्‌ ही है ? इस पर यह भी नहीं कहा जा सकता“ यह कहते है । निखिल शब्दों, उनके अर्थो, उनकी वासनाओं ओर तत्प्रयुक्त संकल्प-विकल्प आदि कल्पनाओं को जाननेवाला जब तीनों अवस्थाओं में (जाग्रत्‌, स्वप्न एवं सुषुप्ति मे) भी एकरूप होने के कारण सत्यस्वरूप हे, तब “यह सर्ग असत्‌ ही हे" यह भी कैसे कहा जा सकता हे ?