Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
भावाभावेषु यत्सत्यं चिन्मज्जाकल्पमेव तत् ।
मज्जासारा पदार्थश्रीस्तन्मयं स्यात्तदेव हि ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार बिल्वाख्यान का भी जगत् की चिन्मात्रसारता में ही तात्पर्य है, इस आशय से कहते हैं ।
भावपदार्थ एवं अभावपदार्थ में जो सत्यभूत चिति-तत्त्व है, वह मज्जासदृश ही ह । बिल्व आदि
पदार्थो की जो शोभा है, उसका तत्त्व मज्जा ही हे, इसलिए वह जगत् आदि मज्जामय ही हे