Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यथाऽमलपयःकोशः स्थलधियां तु भानुभाः ।
सन्नेवासन्निवैवं चिन्नैव त्वं सदसद्वपुः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, मरु-मरीचिका मृग की दृष्टि में निर्मल जल-राशि ही है और "यह
स्थल ही हे" यों विवेक-बुद्धिवाले विद्वानों की दृष्टि में तो वह सूर्य का प्रकाश ही हे । वहाँ जैसे सत्स्वरूप
ही प्रकाश आदि असत् जल-राशि आदिरूप से भासते हैँ, वैसे ही सद्रूप चितिस्वभाव आप भी असत्
जगत् आदिरूप से भासते हैँ । परमार्थतः सद्रूप आप असत् जगद्रूप नहीं हे