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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 37

छतीसर्वौं सर्ग समाप्त सैंतीसवाँ सर्म सद्रस्तु के योग से सत्‌ की सत्ता, परम शिव की अनन्त विभूतियाँ और प्रदानशक्तिरूप नियति का नृत्य इनका वर्णन ।

30 verse-groups

  1. Verses 1–2ईश्वर ने कहा : महर्षे, जिस परब्रह्म परमात्मा में भिण्डि, "भिण्डि," (73) इत्यादि पूर्व सर्…
  2. Verse 3उन्हीं शक्तियों का युक्तिपूर्वक उदाहरण देते हैं । चावल आदि बीजकणों के अन्दर रहनेवाली यह द…
  3. Verse 4फेन एवं आवर्तरूप विवर्त (रूपान्तर) जिसके भीतर रहते हैं वह रसरूपा ईश्वरशक्ति अथवा फेन आदि…
  4. Verse 5पुष्पगुच्छों मे मकरन्दयुक्त गन्धरूप से स्थित हुई यही ईश्वरशक्ति नासिका के पुट मे प्रकाशित…
  5. Verse 6मुने, जिस प्रकार विकारशून्य पर्वतराज तृण, वृक्ष, लता आदि कार्यो को धारण करता है, उसी प्रक…
  6. Verse 7जैसे पिता अपने पुत्र को अपने कार्य में प्रवृत्त कराता है, वैसे ही समस्त क्रियाओं के आधारभ…
  7. Verse 8जिस तरह वह चितिशक्ति प्रवृत्ति शक्तिवश संसारिणी होती है, उसी तरह निवृत्तिशक्तिवश समस्त जग…
  8. Verse 9यही शक्ति महाकाश रूप दर्पण के अन्दर अपनी सत्ता के प्रतिबिम्ब के सदूश कल्प-निमेषनामक निर्म…
  9. Verse 10समस्त शक्तियो का एकीकरण कर उनके कार्यों की इयत्ता का निश्चय कराते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, र…
  10. Verse 11वह चितिसत्ता स्वयं ही उनकी नियामिका क्यों होती है ? इस शंका पर नियमतः उनके प्रकाशन में हे…
  11. Verse 12वही चितिसत्ता गन्धर्वनगर के नाट्य-मण्डप की भूमिरूप जाग्रत्‌ आदि अवस्थाओं में अपनी शक्ति स…
  12. Verse 13महर्षि वसिष्ठजी ने कहा : हे जगत्‌ के स्वामिन्‌, इस सदाशिव की सामान्यतः कौन-सी शक्तियाँ है…
  13. Verses 14–15ईश्वर ने कहा : हे उत्तम व्रत करनेवाले सौम्य, वास्तव मे जिसका कोई भी आकार नहीं है, जो सर्व…
  14. Verse 16इश्वर का असाधरण शक्ति- भेद बतलाकर अव जीवसाधारण शक्ति-भेद बतलाते हैं। ज्ञानशक्ति, क्रियाशक…
  15. Verse 17अद्वितीय वस्तु मे शक्ति ओर शक्तिमत्त्व के भेद में ही जब किसी कारण विशेष का निर्ववन नहीं क…
  16. Verse 18मायिक विकल्पों से जनित कल्पनाओं से होनेवाले चितिभेद ही शक्तिर्या हैं, वे वास्तव मे परमचैत…
  17. Verse 19ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, साक्षित्व आदि कल्पनाओं से परमात्मा की ये शक्तियाँ उस प्रक…
  18. Verse 20गमनशील ब्रह्माण्डरूपी नृत्य-मण्डप मेँ ऋतु, मास आदि काल-नियति-क्रम द्वारा महाकालरूपी नट से…
  19. Verse 21दो परार्धं कालरूप ओर अवान्तर कल्प तथा उसके अवयवकालरूप जो यह मायाशक्ति है, वही नियति कही ज…
  20. Verse 22उस कालशक्ति मे नियतिपद का व्युत्पादन करते हैं। ब्रह्मन्‌, नियम दो तरह के होते हैं एक आकार…
  21. Verse 23ब्रह्मन्‌,जब तक नियति तत्वबोध से परिमार्जित नहीं होती, तब तक सर्वविध उद्वेगो को छोडकर प्र…
  22. Verse 24उसके नृत्य में नाटक के लक्षण बतलाते है । वह नृत्य नाना प्रकार के करूणा आदि रस-विलासों से…
  23. Verse 25समस्त ऋतुरूपी कुसुमं से व्याप्त उस नियति का वह नाट्य वर्षा-धाराओं से ब्रह्माण्ड-गोलकरूपी…
  24. Verse 26मेघरूपी बड़े-बड़े किनारों से चंचल नील-आकाशरूपी वस्त्रों से दिन, रात्रि आदि अनेक तरह के वे…
  25. Verse 27उस नृत्य में आकाशमण्डल याम, पक्ष, दिन आदि प्रक्षण- कटाक्षो से जगमगा रहा है । तिरोधान और उ…
  26. Verse 28घूम रहे चन्द्र और सूर्य से ग्रथित गंगारूपी मुक्तफलों के (मोतियों के) तीन हारों से युक्त त…
  27. Verse 29वह नृत्य निरन्तर शब्द कर रहे चंचल मनुष्य या चतुर्दश भुवनरूपी अलंकारो से अत्यन्त मंजुल लगत…
  28. Verse 30नियति-नृत्य में उदित ओर अस्तमित महान्‌ चमकीले तारे ही स्वेद- विन्दुओं का समूह है । वहाँ च…
  29. Verse 31उस नृत्य में ब्रह्माण्डों की दीवार ही कपाटक की नाई परदे बनाये गये हैं । असुरो द्वारा व्या…
  30. Verse 32महर्षे, नाट्यशास्त्र में प्रसिद्ध स्वेद, स्तंभ, रोमांच आदि विकारों से व्याप्त चिरकाल से प…