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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । शक्तयः कुत एवैता बहुत्वं कथमासु च । उदयश्च कथं देव भेदाभेदश्च कीदृशः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अद्वितीय वस्तु मे शक्ति ओर शक्तिमत्त्व के भेद में ही जब किसी कारण विशेष का निर्ववन नहीं कर सकते तब अवान्तर चित्र- विचित्र शक्तियों के भेद की कथा तो दूर ही रही, यों माननेवाले वसिष्ठजी आक्षेप करते है। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे देव, ये उपर्युक्त शक्त्यो ही किस निमित्त से हुई ? उनमें बहुत्व कैसे आया ? उनका उदय कैसे हुआ ? एवं शक्ति ओर शक्तिमान्‌ दोनों मे परस्पर विरुद्ध ओर अभेद किस युक्ति से रह सकते हैं ?