Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
पवनस्पन्दकोशात्मरूपिणीव त्वगिन्द्रियम् ।
संसाधयत्यात्मसुतं पितेवात्मतयानया ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
पिता अपने पुत्र को अपने कार्य में प्रवृत्त कराता है, वैसे ही समस्त क्रियाओं के आधारभूत पवनप्राय
हुई वह चितिशक्ति त्वगिन्द्रिय को स्पश्ग्रहण करने के लिए अनुकूल बना देती है । (इसी रीति से
अन्य इन्द्रियों में भी प्रवृत्ति शक्तियाँ उसी चितिशक्ति के द्वारा होती हैं, यह जानना चाहिए ।)