Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
इत्यादिकानां शब्दानामर्थश्रीः सत्यरूपिणि ।
तस्मिन्सर्वेश्वरे सर्वसत्तामणिसमुद्गके ॥ १ ॥
का नाम विमलाभासास्तस्मिन्परमचिन्मणौ ।
न कचन्ति विचिन्वन्ति विचित्राणि जगन्ति याः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
ईश्वर ने कहा : महर्षे, जिस परब्रह्म परमात्मा में भिण्डि, "भिण्डि," (73) इत्यादि पूर्व सर्ग के
(79) “इत्यादिकानाम् इस श्लोक में आदि पद से अनर्थरूप से अत्यन्त प्रसिद्ध जरद्गव और
दशदाडिम आदि वाक्यों का भी ग्रहण करना चाहिए । वहाँ पर - जरद्गवः कम्बलपादुकाभ्यां द्वारि
स्थितो गायति मद्रकाणि । तं ब्राह्मणी पृच्छति पुत्रकामा राजन् रुमायां लशुनस्य कोऽर्घः ॥
इस श्लोक का भी लौकिक या पारमार्थिक अर्थ एकमात्र ब्रह्मसत्ता से ही किया जा सकता है ।
उनमें लौकिक अर्थ इस प्रकार है - कोई एक मद्रासी, जो कम्बल और उपानहों से (जूतों से)
युक्त बूढ़े बैल के समान गुण-धर्मवाला होने से जरद्गव वाहीक था, अपने घर के द्वार पर बैठकर
मद्र देश में प्रसिद्ध गीतों को गाता था | उसे कोई ब्राह्मणी जो कि लहसुन से शान्त होनेवाले रोगग्रस्त
पुत्र के साथ किसी आवश्यक कार्य से समुद्र की ओर जानेवाली थी और साथ-साथ वहाँ पर पुत्र
का जीवन भी चाह रही थी-“यह (मद्रासी) लवणसमुद्र की ओर से आया है” यों लोगों से सुनकर
अत्यन्त आदरपूर्वक सम्बोधित करती हुई पूछती है : हे राजन्, लवणसमुद्र मेँ लहसुन का भाव क्या
है अर्थात् क्या वहाँ लहसुन सस्ता है या महँगा है ? इसी श्लोक का पारमार्थिक अर्थ इस प्रकार है -
कम्बल के समान आवरण करनेवाली अविद्या से तथा पादुकाप्राय लिंग शरीर से चक्षु आदि द्वारो पर
विषय-भोग के लिए स्थित हुआ बूढ़े बैल के समान यह जीव वैषयिक स्त्री, पुत्र आदि के मंगल-गीतों
को ही बहिर्मुख होकर गाता है, अपने स्वरूप को बिलकुल ही नहीं देखता । उसे इस प्रकार पाकर
पुंनामक संसार-नरक से उद्धार करनेवाले ब्रह्मात्मरूपताज्ञानस्वरूप पुत्र की इच्छा कर रही, ब्राह्मणी
की नाई, ब्रह्मसम्बन्धिनी श्रुति उससे पूछती है - हे राजन् अर्थात् स्वयं प्रकाशरूप से विराजमान और
अपने चैतन्य से सम्पूर्ण जगत् को रंजित करनेवाले हे आत्मदेव, सभी विद्या, काम और कर्म के बीजों
का विनाशक होने से समुद्र की नाई ऊषरप्राय, परमशुद्ध तुम्हारे स्वरूप के रहते हुए अत्यन्त अपवित्र
होने से ब्राह्मण द्वारा अभोग्य लहसुनतुल्य भोज्यो के विषय में तुम मूल्य ही क्या विचारते हो ? अतः
बाह्य दृष्टि छोडकर स्वात्माराम हो जाओ | इस आशय से वह पूछती है - “यह आत्मा कौन है,
जिसकी हम लोग उपासना करते हैं, वह कौन-सा आत्मा है । जगत् के कारण ब्रह्म का क्या स्वरूप
है ? हम कहाँ से उत्पन्न हुए” इत्यादि । इसी प्रकार दश दाडिमादि वाक्यों में भी अर्थसत्ता समञ्नी
चाहिए । “भिंडि भिंडिम्“इत्यादि श्लोक की तो, जो कि बाल, मत्त आदि के अस्पष्ट कथन का
अनुकरण करता है, अनुकार्य अर्थ से ही अर्थवत्ता जाननी चाहिए । अनुकार्य तो अव्यक्त ही है, अतः
उसमें (अनुकार्य में) वाक्यता ही नहीं है ।
अन्तिम भाग में दर्शित निरर्थक शब्दों की भी अर्थ श्री सत्यप्राय हो जाती है, समस्त जगत्सत्तास्वरूप
मणि के पिटारी रूप मायाशबल सबके नियन्ता उस परमात्मा में जो बीजरूप शक्तियाँ अनेकविध
चित्र-विचित्र जगत् का आरोप करती हैं, उनमें से ऐसी कौन हैं जो विस्पष्ट होकर आविर्भूत
नहीं होती ?
सर्ग सन्दर्भ
छतीसर्वौं सर्ग समाप्त सैंतीसवाँ सर्म सद्रस्तु के योग से सत् की सत्ता, परम शिव की अनन्त विभूतियाँ और प्रदानशक्तिरूप नियति का नृत्य इनका वर्णन ।