Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अस्मिन्विकारवलिते नियतेर्विलासे संसारनाम्नि चिरनाटकनाट्यसारे ।
साक्षी सदोदितवपुः परमेश्वरोऽयमेकः स्थितो न च तया न च तेन भिन्नः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षे, नाट्यशास्त्र में प्रसिद्ध स्वेद, स्तंभ, रोमांच आदि विकारों से व्याप्त चिरकाल से प्रवृत्त हुए
इस संसारनामक नाटक के नाटय में सारभूत नियति नटी के विलास में अधिपति होकर देखनेवाला
सदा उदितस्वभाव यह प्रत्यक् रूप परमेश्वर अद्वितीय ही होकर स्थित है । वह परमार्थतः उस नटी और
नाट्य से भिन्न नहीं हे