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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

एषा बीजकणान्तस्था चित्सत्ता स्ववपुर्मयम् । लब्ध्वा मृत्कालवार्यादि करोत्यङ्कुरमोदनम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

उन्हीं शक्तियों का युक्तिपूर्वक उदाहरण देते हैं । चावल आदि बीजकणों के अन्दर रहनेवाली यह दैवी चितिसत्ता खेत में परिष्कृत मिट्टी, काल, जल आदि सहकारी कारणों को प्राप्तकर पहले-पहल अंकुर पैदा करती है और तदनन्तर क्रमशः तण्डुल (चावल) होकर स्वशरीरमय साक्षात्‌-पुरुष के खाने योग्य ओदन (चावल) बनाती है