Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
अप्रमेयस्य शान्तस्य शिवस्य परमात्मनः ।
सौम्य चिन्मात्ररूपस्य सर्वस्यानाकृतेरपि ॥ १४ ॥
इच्छासत्ता व्योमसत्ता कालसत्ता तथैव च ।
तथा नियतिसत्ता च महासत्ता च सुव्रत ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
ईश्वर ने कहा : हे उत्तम व्रत करनेवाले सौम्य, वास्तव मे जिसका कोई भी आकार नहीं है, जो सर्वात्मक
है तथा साधारण जन जिसका परिज्ञान नहीं कर सकते, उस शान्त, चिन्मात्ररूप सदाशिव परमात्मा की
इच्छासत्ता, व्योमसत्ता उसी प्रकार तीसरी कालसत्ता तथा नियतिसत्ता ओर महासत्ता ये पाँच शक्तियाँ
हैं । तात्पर्य यह है कि सोऽकामयत बहुस्याम्” इस श्रुति के अनुसार सबसे पहले इच्छासत्ता अभिव्यक्त
हुई । तदनन्तर आकाश की अभिव्यक्ति होने पर आकाशसत्ता, तदनन्तर कालात्मक सूत्र की अभिव्यक्ति
होने पर कालसत्ता, सद्रूप के नियत संस्थानवाले भूत, भौतिक पदार्थो का आविर्भाव होने पर नियतिसत्ता
अभिव्यक्त हुई ओर तदनन्तर उनमें अनुगत महासत्ता अभिव्यक्त हुई