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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

आमहारुद्रपर्यन्तमिदमित्थमिति स्थितेः । आतृणापद्मजस्पन्दं नियमान्नियतिः स्मृता ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

उस कालशक्ति मे नियतिपद का व्युत्पादन करते हैं। ब्रह्मन्‌, नियम दो तरह के होते हैं एक आकार नियम ओर दूसरा विकार नियम | उन दोनों नियमों के आधार पर यह कालशक्ति तृण से लेकर महारुद्रपर्यन्त जितने भी पदार्थ हैं, उन सबमें “इस पदार्थ को इस आकार के रूप में ही रहना चाहिए" एवं तृण से लेकर ब्रह्माप्यन्त जितने पदार्थ हैं, उनमें “इस पदार्थ मेँ इस तरह का ही विकार होना चहिए' इस प्रकार आकार-स्थिति ओर विकार स्थिति का नियमन करने के कारण नियति कही जाती है