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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

सर्वर्तुकुसुमाकीर्णं धारागोलकमन्दिरम् । भूयोभूयः पतद्वर्षभूरिस्वेदजलोत्करम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

समस्त ऋतुरूपी कुसुमं से व्याप्त उस नियति का वह नाट्य वर्षा-धाराओं से ब्रह्माण्ड-गोलकरूपी महानाटय-शाला में प्रवृत्त होता है । बार-बार गिर रहे वर्षण से जनित प्रचुर स्वेदरूपी जलराशि से वह निरन्तर आकुल रहता है