Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 33
48 verse-groups
- Verse 1हे महर्षे, चारों ओर से परिपूर्ण इस निर्मल चैतन्याकाश में पहले के अपने शुभाशुभ प्रयत्नों क…
- Verse 2हे महादेव, दूसरा यह प्रश्न है कि अनेक बन्धनों से ग्रस्त चिरकालिक अनुवृत्ति से रूढ हुआ वह…
- Verse 3के कारण अनादि काल से लेकर भ्रान्ति से प्राप्त हुए उस प्रपंच का, अध्यारोप अपवाद-न्याय का आ…
- Verse 4नेह नानाऽस्ति किचन” “न तु तदद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तम् "विभुं चिदानन्दम- रूपमद्भुत…
- Verse 5यहाँ पर एक वस्तु का अभाव होने से एकत्व और द्वित्व दोनों का भी अभाव हे, क्योकि एक के बिना…
- Verse 6अव उपदेश आदि व्यवहार के लिए व्यवहार-दष्टि ओर परमार्थ-द्ष्टि दोनों का संमिश्रण मानने पर भी…
- Verse 7यदि सव विकारों में पारमार्थिक सत्ता से भिन्न दूसरी व्यावहारिक सत्ता का स्वीकार नहीं करते…
- Verse 8उसकी सारता का ही उपपादन करते हैं। यतः षड्भावविकारात्मक तथा उनके आश्रय घट आदि स्वरूप यह प्…
- Verse 9उस तरह जब जगत एकमात्र विकल्पस्वरूप ही सिद्ध हो चुका, तव उसमें कोई पदार्थ (जल, तरंग आदि) व…
- Verse 10हे विप्र, इस संसार में अज्ञानजनित सम्पूर्णं पदार्थो मे परस्पर व्यावृत्तिस्वरूप (परस्पर एक…
- Verse 11जैसे तरंग, कण, कल्लोल ओर जलप्रवाह जल से विभक्त नहीं रहते, वैसे ही तात्त्विक दृष्टि से देख…
- Verse 12तथाच “अपागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, इस श्रुति…
- Verse 13चिति का देश काल, विकार आदि रूप जो भेद किया गया है, वह भेद चितिस्वरूप ही है । इसलिये जब चि…
- Verse 14चूँकि देश, काल ओर क्रिया की सत्ता एवं नियति आदि शक्त्यो स्वयं चिति की सत्ता से ही सत्तायु…
- Verse 15जैसे जल, तरंग आदि में अनुगत जलसामान्य वीचि आदि नामयोम्य होकर स्थित है, वैसे ही चित्त, चेत…
- Verse 16जिसमें तरगों की तनिक भी सम्भावना नहीं हे, एसे चिद्विलासरूपी महासागर का, तरंगवत्ता की नाईं…
- Verse 17वही यह चितितत्त्व परम ब्रह्म, सत्य ईश्वर, शिव आदि तथा शून्य, एक, परमात्मा आदि अनेकविध नाम…
- Verse 18पारमार्थिक मेरा तत्त्व वही है, यह कहते हैं। उन पूर्वोक्त नामों एवं रूपों तथा सामने दिखाई…
- Verse 19जो यह संसार दिखाई दे रहा है, वह चूँकि उस महाचितिरूपी लता के तत्स्वरूप फल, पल्लव तथा पुष्प…
- Verse 20यदि विवेक-ज्ञान के लिए अनृत ही जीव-जगद्धाव पूछ रहे हो, तो सुनो वह चिति जब अविद्यारूपी विच…
- Verse 21“मैं ब्रह्म से भिन्न अचिद्रूप हूँ” यों अज्ञान से भावना करके चिति स्वयं ही अपना संकल्पात्म…
- Verse 22यद्यपि चिति कलंक निर्मुक्त रूप से ही सदा अवस्थित है; तथापि कलंकयुक्त जिस पुर्यष्टक रूप की…
- Verse 23यह चैतन्य शरीर चिति ही स्वयं इस पूर्ववर्णित पुर्यष्टक शरीर के द्वारा तादात्म्यअध्यासस्वरू…
- Verse 24“सर्वव्यापक होती हुई भी चिति इस चित्त में प्रतिबिम्बित होती है” (नि. 32/५२) इस वचन पर किय…
- Verse 25प्राणियों द्वारा खाया गया वह द्रव्य तत्काल ही धातुरूप (वृक्ष आदि में बीज आदि रूप) हो जाता…
- Verse 26(अनुभवात्मकं ब्रह्म ही) उक्त अहन्ता आदि क्रम से तत्कालजनित स्थूलदेहानुभवरूप भ्रम के कारण…
- Verse 27यदि शका हो कि जिस स्थल में मच्छर आदि सूक्ष्म देह का त्याग हुआ है, उस स्थल में उक्त देहाका…
- Verse 28विरोधी वासना के आविर्भाव से पहले की वासना का तिरोभाव और उत्तरकालिक दूसरी वासना की अभ्यास…
- Verse 29जिस प्रकार “मैं कुछ नहीं करता” इस तरह के संकल्प से पुरुष में कर्तृत्व निवृत्त हो जाता है,…
- Verse 30द्वेतसंकल्प से अद्वितीय वस्तु में भी द्वित्व की प्राप्ति हो जाती है ओर अद्वैतभावना से तो…
- Verse 31भद्र, विकार आदि से शून्य, सदा सर्वगामी तथा परमात्मा का स्वरूपभूत होने से आत्मा में कभी द्…
- Verse 32हे मुने, अपने संकल्प से निर्मित मनोराज्य और गन्धर्वनगर की नाई जो वस्तु अपने संकल्प से बना…
- Verse 33मानसिक प्रयत्न के द्वारा किसी की रचना करने में तो श्रम होता भी है, परन्तु संकल्प का विनाश…
- Verse 34केवल दृढ संकल्प से जो यह संसाररूपी दुःख प्राप्त हुआ है, वह केवल संकल्प के अभाव से ही नष्ट…
- Verse 35तनिक भी संकल्प कर मनुष्य दु:ख में डूब जाता है ओर कुछ भी संकल्प न कर वह अविनाशी सुख पाता है
- Verses 36–37महर्षे, जब तक तुम्हारी बुद्धि संकल्परूप सर्पं से निःशेष मुक्त नहीं होती, तब तक सर्वविध गु…
- Verse 38तब संकल्पनाश का क्या उपाय है ? इस प्रश्न पर उसका उपाय बतलाते हैं। हे मुने, अपने विवेकरूपी…
- Verse 39संकल्परूप पवन से कम्पित हुए, पत्तों एवं तिनकों के टुकड़ों की नाई प्राणीमात्र के हृदयाकाश…
- Verse 40अपने-आप अपनी संकल्पात्मक कालिमा का निवारण करके आत्मा की उत्तम विशुद्धता प्राप्तकर अविनाशी…
- Verses 41–42चूँकि, यह आत्मा समस्त शक्तियों से परिपूर्ण है, अतः जब कभी वह किसी वस्तु की जैसी भी पर्याप…
- Verse 43हे ब्रह्मन्, यह उत्पन्न हुआ मिथ्यारूप जगत एकमात्र संकल्पात्मक ही हे, अतः केवल संकल्प के…
- Verse 44हे महर्षे, संकल्परूप जड उखाडकर अत्यन्त दढता को प्राप्त हुई इस तृष्णारूपी करंज लता को तुम…
- Verse 45अविद्या, काम और संकल्प का विनाश होने पर भी यदि जगत का अवभास होता हो, तो वह केवल प्रतिभासर…
- Verse 46जब तक अज्ञान है, तभी तक जगत का प्रतिभास शोक में कारण है, अज्ञान का विनाश हो जाने पर तो वह…
- Verse 47यदि शंका हो कि पहले के दीर्घकाल से अभ्यस्त संसार के अनेक संस्मरण तत्त्वज्ञानी के भी वर्तम…
- Verse 48यही स्मृति प्रबल है, इसमें कारण क्या है ? तो मनन, निदिध्यासन के अभ्यासरूप पुरुष प्रयत्न स…
- Verse 49हे मुने, मैं अद्वितीय शिवरूप देव हूँ, वही देवस्वरूप अद्वितीय शिव तुम्हारे अहंकार से उपलक्…
- Verse 50महर्षे, उक्त रीति से (तुम अद्वितीय -्रह्मभावमयी ही पूजा करो, दूसरी बाह्यपूजा नहीं) यह वाह…