Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
नास्य तज्जातया ब्रह्मन्प्राक्स्मृतिर्वर्तमानया ।
शरदेवोपगतया प्रावृड् जाड्यापवारिणी ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि पहले के दीर्घकाल से अभ्यस्त संसार के अनेक संस्मरण तत्त्वज्ञानी के भी
वर्तमानकालीन मैं ब्रह्मरूप हूँ" इस स्मरण को ढक देंगे, ऐसी स्थिति में उसे पुनः संसार शोक बना ही
रहेगा, तो इस पर कहते हैं।
हेब्रह्मन्, जैसे उपस्थित शरद-ऋतु से निरस्त हुई वर्षाऋतु, मेघरूप जडता से शरद का आच्छादन
करने में सामर्थ्य नहीं रखती, वैसे ही इस राजा और तत्त्ववेत्ता को गुरु के उपदेश से उत्पन्न हुई * मैं
राजा हू, मैं ब्रह्म हूँ" इस स्मृति से निरस्त प्राचीन दुःखों की स्मृति अपनी जडता से आच्छादन करने
में सामर्थ्य नहीं रखती