Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणः सर्वशक्तित्वं तत्त्वतो न विभिद्यते ।
तरङ्गकणकल्लोलजलौघ इव वारिणः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तरंग,
कण, कल्लोल ओर जलप्रवाह जल से विभक्त नहीं रहते, वैसे ही तात्त्विक दृष्टि से देखने पर तो ब्रह्म
की सर्वशक्तिता अर्थात् समस्त जगत के आकार में दुश्यमान मायिक रूपता वास्तव में ब्रह्म से विभक्त
नहीं रहती यानी उसी में तिरोहित हो जाती है