Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
प्रभुरस्मीति विस्मृत्य तावच्छोचति भूमिपः ।
भूमिपोऽस्मीति संजाता यावन्नास्य हृदि स्मृतिः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक अज्ञान है, तभी तक जगत का प्रतिभास शोक में कारण है, अज्ञान का विनाश हो जाने पर
तो वह शोक में कारण नहीं है, इस आशय से कहते है।
मैं राजा हूँ यों अपना असली स्वरूप भूलकर तभी तक राजा शोक करता है जब तक कि उसके
हृदय में “मैं राजा हूँ” यों अपने वास्तव स्वरूप की स्मृति उत्पन्न नहीं हो जाती