Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चन्द्रार्धशेखरधर चित्तत्त्वस्य महात्मनः ।
अनन्तस्यैकरूपस्य द्वित्वं कथमुपागतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महर्षे, चारों ओर से परिपूर्ण इस निर्मल चैतन्याकाश
में पहले के अपने शुभाशुभ प्रयत्नों के परिणामस्वरूप; अतएव सुख, दुःख आदि फलों के भोग-काल में
हास्य, रोदन आदि कोलाहलों से मुखरित, चित् और अचित् से प्रचुर ये जीव-जगद्गूपी कल्पनाएँ
आपाततः रमणीय होती हुई विविध शरीरो के द्वारा जन्म, मरण आदि भ्रान्ति से आत्मा को मोहित करने
ओर संताप करने के लिए प्रतिभासित होती हैं ॥५ ३॥
बत्तीसवाँ सर्ग समाप्त
तैंतीसवाँ सर्ग
मोह एवं तज्जनित संकल्पों से कल्पित जीव-जगद्भेदों का,
विचार-कसौटी में जिस तरह वे नहीं ठहरते उस तरह, तर्को से वर्णन ।
सर्वत्र व्यापक भी विति इस चित्त में प्रतिबिम्बित होती है” तथा पीछे दृढ़ भावना से उसी चित्त में
आनन्द मनाती है. इत्यादि जो कहा गया है, उन दोनों ही स्थलों में महाराज वस्रिष्ठणी अनुपपत्ति की
आशंका करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : मस्तक में अर्धचन्द्र धारण करनेवाले हे भगवन्, व्यापकस्वरूप अनन्त
एवं अद्वितीयरूप चैतन्य-तत्तव में द्वित्व (भेद) कैसे प्राप्त (0) हुआ ?