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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

विकारादिविकल्पोऽयं तत उत्थाय वस्तुषु । याति सार्थकतां नानाकार्यकारणतादिभिः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी सारता का ही उपपादन करते हैं। यतः षड्भावविकारात्मक तथा उनके आश्रय घट आदि स्वरूप यह प्रपंच विकल्पात्मक हे, अतः वह एकमात्र सद्रस्तु से ही आविर्भूत होकर जलाहरण आदि अनेकविध कार्यकारणता आदि से वस्तुओं में सार्थकता प्राप्त करता है अर्थात्‌ उसका भोग में पर्यवसान हो जाता हे । चिति में पर्यवसानतारूपही भोग पदार्थ है, इसलिये चिन्मात्र ही सारभूत वस्तु है, यह भाव है