Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
देशकालविकारादिः कृतो भेदश्चितस्तु यः ।
तच्चिदेतदसत्प्रोक्तं न प्रश्नोऽत्र तवोचितः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति का देश काल, विकार आदि रूप
जो भेद किया गया है, वह भेद चितिस्वरूप ही है । इसलिये जब चिति में द्वैत (भेद) है ही नहीं तब उसमें
भेद आया कहाँ से ? यह तुमने असत् कहा हे । ऐसे असद्विषय में तुमं प्रश्न करना उचित नहीं हे