Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चित्त्वं चेत्यविकल्पेन स्वयं स्फुरति तन्मयम् ।
विकारादि तदेवान्तस्तत्सारत्वान्न भिद्यते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सव विकारों में पारमार्थिक सत्ता से भिन्न दूसरी व्यावहारिक सत्ता का स्वीकार नहीं करते तो
द्वैत चिद्विकल्प ही है, यह फलित हुआ। ऐसी स्थिति में राहु और उसके मस्तक में द्वैत का विरोध उठाने
के सदश ही आपका आक्षेप है, यह कहते हैं।
चितितत्त्व जगद्रूप चेत्य के विकल्प से चेत्यमय होकर स्वयं स्फुरित होता है विकार आदि जितने
पदार्थ हैं, वे सबके सब तत्स्वरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं; क्योकि उन विकारों का भीतरी तत्त्व वही
चिति हे । इसलिये माया ओर उनके कार्यों की पृथक् सत्ता है, यह पक्ष; अपृथक् सत्ता है, यह पक्ष;
असत्ता है, यह पक्ष; या वे किसी तीसरे प्रकार के हैं, यह पक्ष; या अनेकवादियों द्वारा कल्पित वे प्रधान,
परमाणु, क्षणिक, अक्षणिक, विज्ञान और शून्यरूप इनमें से चाहे जिस किसी पक्ष का भी तुम अवलम्बन
करो, फिर भी असंग, अद्रय, चिन्मात्रवस्तु से तनिक भी स्पर्श न कर रहे सब पक्ष एकमात्र चैतन्य से ही
सिद्ध हैं इसलिए जहाँ चिति को कभी भी बन्धप्राप्ति ही नहीं होती, वहाँ (उस पक्ष में) अनिर्मोक्ष की
शंका का उद्भावन तो दूर से ही निरस्त है, यह भाव है