Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
द्वित्वस्वसंविदा द्वित्वमेकस्यैव प्रवर्तते ।
पुंसो वेतालसंकल्पाद्वेताल इव भासुरः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
विरोधी वासना के आविर्भाव से पहले की वासना का तिरोभाव और उत्तरकालिक दूसरी वासना
की अभ्यास से दृढता होती है, इस विषय में दृष्टान्त कहते हैं।
अपने ही द्वैतसंकल्प से एक में ही द्वैत की ऐसे प्रवृत्ति हो जाती है, जैसे पुरुष की वेताल-कल्पना
से उसमें भयंकर भासुर वेताल प्रवृत्त हो जाता है