Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
सर्वशक्ति हि तद्ब्रह्म सदेकं विद्यते यदा ।
तदा निर्मूल एवायं द्वित्वैकत्वकलोदयः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
के कारण अनादि काल से लेकर भ्रान्ति से प्राप्त हुए उस प्रपंच का, अध्यारोप अपवाद-न्याय का
आश्रय लेकर, अपवाद करने के लिए ही प्रवृत्त हुए हैं। अध्यारोप मे जो सृष्टि के प्रारम्भ काल में काम,
कर्म, वासना आदि निमित्तकारणः ब्रह्म, अविद्या आदि उपादान कारणः आकाश आदि पदार्थो की
उत्पत्ति का क्रम; व्यष्टि, समष्टि, स्थूल. सूक्ष्म आदि विभाग एवं अन्नमय आदि कोश- भेदों की कल्पना
की जाती है वह सव स्वयं यद्यपि असत्य है, तथापि सत्यवस्तु का परिवय कराने के लिए उपयोगी होने
के कारण श्रुति ने उसकी कल्पना की है ओर परमार्थ सत्य वस्तुरूप प्रयोजन के सर्वसम्मत होने के
कारण इतरवादियो की अपेक्षा उत्कृष्ट है । अतः श्रोताओं का विश्वास सम्पादन करने के लिए लोकद्रष्टि
से ही युक््तियों द्वारा शास्त्रों में उसका समर्थन किया गया है । जब सवत्मिक प्रत्यगात्मा का परिचय हो
जाता है, तब सर्वात्मा में अद्वितीयत्व के बोधन के लिए परमार्थ दृष्टि का आश्रय लेकर प्रप॑ंच का अपवाद
किया ही जाता है । इसलिए आत्मा में एकत्व का स्वीकार कर उससे विरुद्ध द्वित्व के असम्भव का
प्रतिपादन तुम्हारे अपने स्वीकृत पक्ष से विरुद्ध ओर सिद्धान्त से विरुद्ध है, इसके ऊपर दृष्टि क्यो नहीं
डालते, इस आशय से भगवान कहते है ।
ईश्वर ने कहा : हे ब्रह्मन्, व्यवहार दुष्ट से ब्रह्म सर्वशक्ति से समन्वित है ओर परमार्थ -दृष्टि से
एक और सदात्मक ही है, यों जब व्यवस्थित दो दृष्टियों का अंगीकार किया जा चुका है, तब सर्वशक्तिरूप
दुष्टि के एकदेश से उदित हुई द्वित्व-एकत्वरूप कल्पना से युक्त उक्त आक्षेप निर्मूल ही हे । क्योकि
व्यवहार दृष्टि से परमात्मा में सब द्वित्व आदि कल्पनाओं का आरोप होता है और परमार्थदृष्टि से
अपवाद होता है । व्यवहार दृष्टि से “यः सर्वज्ञः स सर्ववित्“ इत्यादि श्रुति से उपपादित सर्वज्ञ
सर्वशक्तिसमन्वित परमात्मा से जीवजगद्रूप द्वैत का आविर्भाव मानने में कुछ भी अनुपपत्ति नहीं होती,
क्योकि धर्मिग्राहक प्रमाण से सर्वशक्ति का वैसा स्वभाव ही है, यह निर्णीत हो चुका हे । “तदेतदृब्रह्मापूर्व,
स्वाभाविक है ? प्रथम पक्ष में (आगन्तुक पक्ष में) भी वह स्वयं उत्पन्न हुई या दूसरे के सम्बन्ध से,
यों जब विचार करेगे, तो अनिर्मोक्ष एवं अनवस्था आदि दोषों की ही प्रसक्ति होगी । मायाशक्ति के
स्वाभाविकत्वपक्ष में, अग्नि में से उष्णता की नाई, ब्रह्म मेँ से उसका निवारण न कर सकने के कारण
एक तो अनिर्मोक्ष दोष और दूसरा एकरसरूपता की प्रतिपादक श्रुतियों के साथ विरोध होगा ।
मायाशक्ति मिथ्या है, यह मान लिया जाय तो वह अत्यन्त असतपदार्थरूप हो जायेगी । ऐसी स्थिति
में असत् के कार्योत्पादक न हो सकने के कारण फिर वही घुमा-फिरा कर बात आ गई कि द्रैतोत्पत्ति
निर्हेतुक ही है । यदि उसे सत्य मान लिया जाय तो, ज्ञान से उसकी निवृत्ति न हो सकने के कारण
अनिर्मोक्षदोष, यों दोनों ओर से रस्सी कसी जायेगी । पदार्थस्वरूपता निष्कर्ष निकालने में कोई सद्रूप
और कोई असद्रूप ही ठहरता है । इन दो प्रकारो से भिन्न कोई तीसरा प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता,
इसलिए उक्त मायाशक्ति सत् ओर असत् से भिन्न कोई तीसरे प्रकार की नहीं हो सकती । यदि
तीसरे प्रकार की मान ली जाय, तो भी उसी प्रकार से ज्ञानोत्तर भी द्वैत का निरसन नहीं हो सकता ।
कोई ज्ञानी यह चाहे कि उस तीसरे प्रकार का पहले या दूसरे प्रकार रूप में हम निर्माण कर लेंगे, तो
वह भी युक्त नहीं है, क्योकि ज्ञान कारक नहीं है, अन्य अन्यरूप हो नहीं सकती, स्वरूप परिवर्तन
देखा नहीं जाता, उत्पादित नश्वर होता है, अतः पुनर्बन्धन का निवारण भी नहीं हो सकेगा ।
"यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति' इत्यादि श्रुतिप्रदर्शित परमार्थदृष्टि से गम्य चैतन्य में तो कभी भी
द्वित्व और द्वित्वविरोधी एकत्व की प्राप्ति हो ही नहीं सकती, इसलिए वहाँ द्वित्व ओर उसके विरोधी
एकत्व आदि की अनुपपत्ति बतलाना भी अयुक्त ही है