Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
अहंतादिक्रमेणाशु पञ्चकानुभवभ्रमात् ।
स्थावरं जंगमं सर्वं वेत्ति तत्तद्भवत्यलम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
(अनुभवात्मकं ब्रह्म ही) उक्त अहन्ता आदि क्रम से तत्कालजनित स्थूलदेहानुभवरूप भ्रम के कारण
चक्षु आदि के द्वारा स्थावर-जंगमरूप समस्त बाह्य जगत जानता हे । पुनः उसकी वासना से स्वयं भी
(4.) प्रस्तुत श्रुति में इति शब्द भावी देह के अनुकूल द्रव्यमात्र का उपलक्षण है । उससे स्थावर,
स्वेदज आदि देहस्थल में तत्तत् बीज के अनुकूल जल आदि द्रव्यरूप भी यह होता है, यह द्योतन
करने के लिए प्रकृत में द्रव्यमस्मीति वेत्ति" यों सामान्यरूप से कहा गया है, यह जानना चाहिए |
पर्याप्तरूप से तत्-तत् पदार्थ-स्वरूप हो जाता हे