Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 26
पचीसवाँ सर्ग समाप्त छब्बीसवाँ सर्ग प्राणोपासना द्वारा इस प्रकार अपने स्वरूपविज्ञान का निरूपण करने के अनन्तर भुशुण्डजी अपनी चिरंजीविता में हेतुओं का निरूपण करते हैं, यह वर्णन ।
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- Verse 1भुशुण्ड ने कहा : महाराज वसिष्ठजी, मैंने प्राणोपासना द्वारा उक्त रीति से क्रमशः निर्मल हुए…
- Verse 2हे महामुने, मैं इस प्राणदृष्टि का अवलम्बन कर दृढ़तापूर्वक अवस्थित रहता हूँ । इसलिए सुमेरु…
- Verse 3ब्रह्मन्, वैठते, जागते या सोते तथा स्वप्नानुभव करते किसी भी अवस्था में मेरी आत्मा में यह…
- Verse 4निरन्तर विनाशशील, अतिचंचल, इष्ट ओर अनिष्ट स्वरूप इन जागतिक अवस्थाओं में मैं किसी प्रकार क…
- Verse 5महाराज, किसी समय किसी कारणवश नक्षत्रचक्र का आधारभूत प्रवहनामक वायु बन्द भी हो जा सकता है,…
- Verse 6हे तपस्वियो में महान, प्राण ओर अपान के अनुसरण से प्राप्त परम तत्त्व के साक्षात्कार से मैं…
- Verse 7ब्रह्मन्, महाप्रलय से लेकर प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश का अनुभव कर रहा मैं धीरबुद्धि…
- Verse 8महाराज, मैं कभी अतीत एवं अनागत विषयों का चिन्तन नहीं करता, एकमात्र नित्य वर्तमानस्वभाव सा…
- Verse 9ब्रह्मन्, व्यवहारवश यथा समय जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फल की अभिलाषाओं को छ…
- Verse 10हे मुनिवर, इच्छा एवं अनिच्छा से निरन्तर अयुक्त इष्ट-अनिष्ट पदार्थो की चिन्ता का विचार कर…
- Verse 11भगवन्, प्राण ओर अपान के सन्धिस्थान में प्रकाशित हो रहे आत्मतत्त्व का निरन्तर ध्यान करता…
- Verse 12महाराज, मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्य मेँ दूसरा सुन्दर प्राप्त करूँगा, इस प्रकार की…
- Verse 13हे साधो, किसी समय कहीं पर अपने या दूसरे किसी के कार्यो की न तो कुछ स्तुति करता हूँ ओर न क…
- Verse 14महर्षे, मेरा मन इष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होने पर न सन्तुष्ट होता है ओर न तो अनिष्ट वस्तुओ…
- Verse 15चूँकि समस्त द्वैत के बाध रूप उत्तम त्याग का अवलम्बन कर सर्वदा ही जीवन के अभिमान आदि सभी व…
- Verse 16हे मुने, मेरे मन की चपलता विलीन हो गई हे । वह शोक से रहित हो गया है, स्वस्थ, समाहित एवं श…
- Verse 17चूँकि मैं लकड़ी, विलासिनी रमणी, पर्वत, तिनका, अग्नि, हिम, आकाश इन सबमें एकरूपता ही देख रह…
- Verse 18आज मैंने क्या प्राप्त किया ओर कल प्रातः मुञ्चे क्या प्राप्त होगा, इस प्रकार चिन्तारूपी ज्…
- Verse 19जरा एवं मरण के सदृश कष्टों एवं राज्यप्राप्ति के सदृश सुखों के प्राप्त होने पर न तो मैं रत…
- Verses 20–21हे ब्रह्मन्, यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरे का है, इस प्रका…
- Verse 22महाराज, नानावस्तु के रूप में प्रकाशित होनेवाले समस्त वस्तुओं के अधिष्ठानभूत, आदि ओर अन्त…
- Verse 23महाराज, विकारवर्जित अवस्था में स्थित हुआ मैं इस संसार में उत्पन्न घट आदि कार्यविशेषों को…
- Verse 24प्रारब्ध के द्वारा प्रस्तुत किये गये उपभोग-समय में प्राप्त हुए इष्ट और अनिष्ट पदार्थ मेरी…
- Verse 25अपने स्वरूप से किसी समय च्युत न होनेवाली मानसिक स्थिरतारूपी शक्ति के द्वारा हुई स्निग्ध ए…
- Verse 26महाराज, मैंने अहंकाररूपी कीचड़ का परित्याग कर दिया है । इसलिए पैर से लेकर मस्तक तक इस देह…
- Verse 27महाराज, मैं जो कुछ व्यापार करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ वह सब कुछ अभिमान का परित्याग कर…
- Verse 28हे मुने, जब-जब मैं कुछ जानता हूँ, तब-तब मेरा मन अविनीतभाव को प्राप्त नहीं होता । इसलिए अन…
- Verse 29महाराज, यद्यपि मैं दूसरों के ऊपर आक्रमण करने में समर्थ हूँ, तथापि मैं आक्रमण (परिभव) नहीं…
- Verses 30–31चेतनप्राय इस शरीर के भासमान होने पर भी मैं एकमात्र चैतन्यात्मता का ही अवलोकन करता हू । इस…
- Verses 32–33ब्रह्मन्, निरन्तर समाधियुक्त मे अनेकविध आशारूपी पाशो से बद्ध हुई चित्तवृत्ति को अपने हृद…
- Verse 34महाराज, जीर्ण, विदीर्ण, अवयवों से शिथिल क्षीण, क्षुब्ध, चूर्णित एवं विनष्ट हुए सब अतीत, अ…
- Verse 35मैं आपत्ति-काल में पर्वत की नाई धीर रहता हूँ, सम्पत्ति-काल में समस्त जगत के प्रति मैत्री…
- Verse 36न मैं हूँ, न मेरे लिए कोई दूसरा है और न मैं किसी दूसरे के लिए हूँ, इस प्रकार की भावना से…
- Verse 37में ही जगत हूँ, मैं ही आकाश हूँ, मैं ही देश ओर काल की परम्परा हूँ, मैं ही क्रियारूप हूँ,…
- Verse 38क्या सर्वत्र स्थल में विद्यमान जडता को लेकर ही तुम अहंबुद्धि करते हो ? नहीं, ऐसा उत्तर दे…
- Verse 39उपसंहार करते हैं। हे मुनिशार्दुल, मेरुरूपी पद्मबीज के कोष में (कमल के छन्त में) रहने तथा…
- Verse 40हे ब्रह्मन्, ब्रह्मरूपी समुद्र में चलायमान, उत्पत्ति, वृद्धि, विपरिणाम और अपक्षयरूप अभिभ…