Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यत्करोमि यदश्नामि तत्त्यक्त्वा तद्वतोऽपि मे ।
मनो नैष्कर्म्यमादत्ते तेन जीवाम्यनामयः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, मैं जो कुछ व्यापार करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता
हूँ वह सब कुछ अभिमान का परित्याग करके ही । इसलिए शरीर के कारण तादृश व्यापारयुक्त होने पर
भी मेरा मन कर्तृत्व-भोक्तृत्वशून्य स्वभावरूपता का ही स्वीकार करता है। यही कारण है कि मेँ अनामय
होकर दीर्घजीवी हूँ