Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
भावाभावमयीं चिन्तामीहितानीहितान्विताम् ।
विमृश्यात्मनि तिष्ठामि चिरं जीवाम्यनामयः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिवर, इच्छा एवं अनिच्छा से
निरन्तर अयुक्त इष्ट-अनिष्ट पदार्थो की चिन्ता का विचार कर यानी वे सर्वथा हेय ही हैं, ऐसा निश्चय
कर केवल अपने स्वरूप में ही स्थित रहता हू। इसलिए मे शोकरहित होकर चिरकाल से जी रहा हूँ यानी
दीर्घजीवी हूँ