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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अपि संरुध्यते वायुरपि वा सलिलं गतेः । नैतस्मात्सुसमाधानाद्विरुद्धं संस्मराम्यहम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, किसी समय किसी कारणवश नक्षत्रचक्र का आधारभूत प्रवहनामक वायु बन्द भी हो जा सकता है, बड़ी-बड़ी महानदियों के जल अपने स्वाभाविक प्रवाह से विरत भी हो जा सकते हैं, परन्तु मुझे अपने इस प्राणचिन्तनरूप उपासना से विरत करा दे, ऐसा कोई भी पदार्थ इस संसार में नहीं है, इसका मुझे निश्चित स्मरण है