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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

आहरन्विहरंस्तिष्ठन्नत्तिष्ठन्नुच्छ्वसन्स्वपन् । देहोऽहमिति नो वेद्मि तेनास्मि चिरजीवितः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, नानावस्तु के रूप में प्रकाशित होनेवाले समस्त वस्तुओं के अधिष्ठानभूत, आदि ओर अन्त से शून्य विकारवर्जित अवभासक आत्म-पदार्थ को तथा भासित होनेवाले इस समस्त प्रपंच को एकमात्र चित्स्वरूप ही मैं जानता हूँ इसी से मैं शोकरहित जीवित हूँ २१॥ ग्रहण कर रहा, विहार कर रहा, स्थिति कर रहा, उत्थान कर रहा, श्वास ले रहा तथा निद्रा ले रहा शरीर ही है, आत्मा नहीं, यह मैं जानता हूँ, इसलिये मैं चिरजीवी हूँ